भारतीय सिनेमा संदर्भ में हिन्दी सिनेमा का बडा हिस्सा आता है । फिल्मों की संख्या एवं राष्ट्रीय फिल्म बाजार आधार पर ऐसा कहा जा सकता है। सितारों में नायक-नायिका ही नहीं और लोग भी मिलेंगे। सितारों में उन सबकी बात की जानी चाहिए जिनका सामर्थ्य फिल्म विधा को जीवित रखता है। कह सकते हैं कि फिल्म-मेकिंग तकनीक खोज से लेकर उसके आकर्षक प्रयोग में इंसानी क़ुव्वत काम कर गई
सिनेमा का इतिहास उसे सभी स्थितियों में एक रूचिपूर्ण विषय बनाता है। इस नजर से चलती तस्वीरों का सफर एक घटनाक्रम की तरह सामने आता है। समय के साथ बहते हुए फिल्मों की दुनिया का बडा हिस्सा गुजरा दौर हो जाता है। बीता वक्त वर्त्तमान व भविष्य का एक संदर्भ ग्रंथ है। सिनेमा की मुकम्मल संकल्पना अतीत से अब तक के समय में समाहित है। हिंदी फिल्मों का कल और आज अनेक भूली-बिसरी कहानियों को संग्रहित किए हुए है। तस्वीरों की कहानी के भीतर कई कहानियां हैं। हिंदी सिनेमा की तक़दीर में इनका योगदान बीते वक्त की बात होकर भी विमर्श का विषय है।यह शख्सियतें कभी न कभी फिल्म उद्योग के एक्टिव कर्मयोगी रहे। कलाकारों व तकनीशियनो के दम पर यह उद्योग संचालित है।

विभाजन के मददेनजर चालीस के दशक में बडी संख्या में पलायन हुआ। सिनेमा भी इस मायने में अछुता न रहा कि बडे नाम कलकत्ता से बंबई कूच कर गए थे । कलकत्ता का ‘न्यु थियेटर्स’ प्रतिभा पलायन के संकट से जूझ रहा था। सहगल के रूप में एक बडा नाम अब बांबे जा चुका था। असित बारन जैसे नए कलाकारों ने अपूर्व क्षति के क्षण में कंपनी को सहारा दिया। कहना होगा कि उभरते सितारों में ‘न्यु थियेटर्स’ को भविष्य नजर आया। ग्रामोफोन कंपनी व आल इंडिया रेडियो के रास्ते फिल्मों में आए असित सहगल की तर्ज पर पार्श्व गायन के साथ अभिनय भी किया करते थे। लीड भूमिकाओं से पहल कर चरित्र किरदारों में रम गए।
भारतीय सिने जगत में गोहर मामजीवाला उर्फ मिस गोहर का योगदान स्मरण का विषय है। गुजरे दौर की समृतियों में यह एक नाम बहुमुखी प्रतिभा वाली नारी शक्ति का जिक्र करता है। अभिनेत्री, स्टुडियो संचालक व फिल्ममेकर गोहर एक प्रेरक व्यक्तित्व की मालिक रहीं। मूक युग से शुरू हुआ सफर बोलती फिल्मों के जमाने तक रहा। बंब ई के उच्च बोहरी घराने से ताल्लुक रखने वाली गोहर गुलाबों की सेज पर पलीं। पढले-लिखने के शौक ने सभ्य,शिक्षित व्यक्तित्व को आकार दिया। खानदानी व्यवसाय को मिला नुकसान अमीरी के पलों को जब्त कर गया। पारिवारिक मित्र होमी मास्टर(अभिनेता) ने गोहर को फिल्मों में किस्मत आकर बिगडी तक़दीर संवारने का मशविरा दिया। कोहीनूर फिल्मस के बैनर तले बनी मूक फिल्म से फिल्मों में दाखिल हुईं।
उस दौर में कोहीनूर की ज्यादातर फिल्मों में गोहर को लीड रोल मिला। बैनर की चर्चित ‘शीरीं-फरहाद’ को आज भी याद किया जा सकता है। गोहर की दमदार भूमिका ने हर किसी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। कोहीनूर के लिए काम कर रहे चंदूलाल शाह ने भी इस प्रतिभा को नोटिस किया। अब से चंदूलाल गोहर को ही लीड रोल देने लगे। उनके द्वारा निर्देशित अधिकांश फिल्मों में गोहर लीड भूमिकाओं में रहीं। चंदूलाल-गोहर का विवाह उस दौर की एक सनसनीखेज खबर थी। पत्नी के सहयोग से चंदूलाल ने ‘रंजीत स्टुडियो’ की नींव रखी। रंजीत की स्थापना दरअसल तत्कालीन सिनेमा में स्टुडियो युग की बात कहता है।
संगीतकार गुलाम हैदर का नाम संगीत की दुनिया का बडा नाम जरूर है, लेकिन अब यह नाम सुनने को नहीं मिलता। हैदर साहेब की संगीत बंदिश पुरानी होकर भी फीकी नहीं।उनकी कुछ उपलब्ध रचनाओं को महसूस कर यही कहा जा सकता है । चालीस के दशक में फिल्म संगीत को सौंदर्यशास्त्र से जोडने की मुहिम का महत्त्वपूर्ण हिस्सा थे।अभियान भारतीय फिल्म संगीत को उचित सम्मान दे सका था। पंचोली प्रोडक्शन की फिल्मों को गुलाम हैदर की वजह से ख्याति मिली।पंचोली,फिल्मिस्तान,मिनरवा जैसे बडे बैनर हैदर साहेब की सेवाएं ले रहे थे।
शास्त्रीय व फिल्म गायिका जोहराबाई का ताल्लुक पहली पीढी के फिल्म गायकों से है। उनकी प्रतिभा को उस्ताद गुलाम हुसैन खान एवं उस्ताद नासिर खान का सान्निध्य प्राप्त हुआ। जोहरा आपा को भारतीय शास्त्रीय संगीत के ‘आगरा घराने’ का प्रशिक्षण मिला। इस सबब में उन्हें ‘जोहराबाई आगरेवाली’ भी संबोधित किया जाता है। रेडियो से सिनेमा में कदम रखा था। आल इंडिया रेडियो ने शास्त्रीय गायन के कार्यक्रम हेतु मुकर्रर किया था। इस दरम्यान ‘एच एम वी’ के द्वारा उनका एक एलबम भी जारी हुआ। फिल्मों में दखल के हिसाब यह एक महत्त्वपूर्ण बात थी। संगीतकार पंचसुख नायक ने पहला मौका दिया। हिंदी सिनेमा में पंचसुख नायक का व्यक्तित्व एक भूला-बिसरा नाम है। नायक साहेब की ‘खोज’ नौशाद साहेब के संपर्क में निखर आई। जोहरा आपा के सुरों से सजे कुछ बेहद उम्दा गीत रतन,अनमोल घडी तथा मेला का ताकतवर पक्ष था। गौर करें कि वर्षों पहले आया ‘अंखियां मिला के जिया भरमा के’ आज भी हिट है।
अभिनेत्री जमना पीसी बरूआ की एक महत्त्वपूर्ण खोज थीं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि फिल्मों में बरूआ के माध्यम से आई थीं। बरुआ की जीवनसाथी जमुना ने ज्यादातर पीसी बरूआ की फिल्मों में अभिनय किया। तीस के दशक में ‘न्यु थियेटर्स’ कलकत्ता के साथ कैरियर का आगाज किया। जमुना का शुमार उस जमाने की टाप सिने तारिकाओं में हुआ। बरूआ की पथ-प्रदर्शक प्रस्तुति ‘देवदास’ के बांग्ला व हिंदी संस्करण में लीड किरदार अदा किए।
फिल्म की जबरदस्त कामयाबी ने भारतीय सिनेमा में नयी आशाओं का संचार किया। इसकी खनक अंतराष्ट्रीय स्तर पर सुनी गई। बरूआ की मंजिल, अधिकार एवं जिंदगी को इससे काफी संबल मिला। एक दशक से अधिक समय न्यू थियेटर्स के साथ बीता। इस दरम्यान एक से बढकर एक उल्लेखनीय फिल्में की। बरुआ के साथ ‘जिंदगी’ करने बाद ‘जवाब’ तथा ‘उत्तरायण’ जैसी महत्त्वपुर्ण फिल्में अन्य फिल्में बाहर जा कर की। देबकी बोस की ‘सुलह’ भी न्यु थियेटर्स के बाहर जमुना की एक बडी फिल्म थी। चालीस दशक के मध्य में चिंताजनक निराशा हांथ लगी। फिल्मकार राम दरियानी जमुना की सहायता में आगे आए। दरियानी को ‘हिंदुस्तान हमारा’ के लिए स्मरण किया जा सकता है। दरअसल जमुना को एक बार फिर लाईमलाइट में दरियानी ही लेकर आए। लेकिन इस बिंदु पर उन्हें पीसी की क्षति का भी सामना था। सिनेमा को अलविदा कह कर जमुना ने किनारा कर लिया।
हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में दान सिंह जैसे संगीतकारों का
नाम अक्सर विमर्श का हिस्सा न रहा। फिल्म संगीत के उस बेहतरीन जमाने में कुछ संगीतकारों ने बहुत गिनी चुनी फिल्मों में काम किया। कहा जा सकता है कि काम की संख्या कम होने की वजह से संगीतकारों को भूला दिया गया। इस श्रेणी में दान सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। संगीतकार दान सिंह का स्मरण होते ही ‘माई लव’ के हिट गीत का ख्याल आता है। हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्ण युग से सिनेमा में आने वाले दान सिंह के लिए यह फिल्म महत्त्वपूर्ण पडाव कही जा सकती है। कह सकते हैं कि दान सिंह के धुनों को खूब सराहना मिली। किंतु इस महान मोड बाद भी दान जी को खास अवसर नहीं दिए गए।
फिल्मी गीतों को अनावश्यक साहित्यिक लेबल से मुक्त कर सहज विधा बनाने में गीतकार दीनानाथ मढोक की पहल स्मरणीय है। चालीस दशक की बहुत सी हिट फिल्मों में दीनानाथ की प्रतिभा उभरकर आई। उस दौर की फिल्मों में तानसेन,रतन एवं भक्त सूरदास के गीत बेहद लोकप्रिय रहे। कलकत्ता के ‘न्यु थियेटर्स से फिल्मों में आने वाले दीनानाथ ने पहले पहल बतौर हीरो काम किया। किंतु उन्हें समझ आ गया कि लेखन को उनकी ज्यादा जरूरत है। चालीस के दशक में बडी हिट फिल्मों के टीम का अहम हिस्सा रहे दीनानाथ ने बेहतरीन गीत लिखे। उस दौर की फिल्मों में होली,कानून व तानसेन का यहां उल्लेख किया जा सकता है। उनके जीवन में ‘तानसेन’ मील का पत्थर साबित हुई। फिर ‘अंखिया मिला के जिया भरमा के’ और ‘आई दीवाली आई’ जैसे सदाबहार गीतों से सजी ‘रतन’ भी बेहद कामयाब रही।
अभिनेत्री बीना राय का स्मरण दरअसल अनारकली, ताजमहल जैसे शाहकारों को स्मरण करना है । बीना राय का व्यक्तित्व इन फिल्मों को खास बनाता है । किशोर साहू, नंदलाल जसवंतलाल(अनारकली), रामानंद सागर की परखने हमें बीना राय से परिचित कराया। उनकी हिट फिल्मों के गीत आज भी श्रोताओं को आकर्षित करते हैं। जरा ‘ताजमहल’ के गीत ‘जो वादा किया’ का ही उदाहरण देखें। एक सदाबहार गीत का दर्जा रखने वाले इस गीत को लेकर आज भी एक दीवानगी होगी। अफसोस बडी संभावनाओं वाली बीना जी सिल्वर सक्रीन पर दीर्घ सफर तय न कर सकीं। कैरियर की ऊंचाई पर सिनेमा से किनारा कर लिया। बेहद सफल ‘ताजमहल’ एवं ‘वल्लाह क्या बात’ बाद फिल्मों से अलग रहने लगी। अब यह बात समृतियों में नही होगी कि बेहतरीन अभिनय के लिए बीना जी को कभी ‘फिल्मफेयर’ अवार्ड
भी मिला था ।
कोल्हापुर के कलाप्रेमी घराने से ताल्लुक रखने वाले बाबूराव पेंटर कला की पहली दीक्षा घर पर मिली। चित्र व मूर्तिकला को सीखकर परिवार की संपन्न सांस्कृतिक विरासत को कायम रखा। बंबई स्थित पारिवारिक फोटो स्टुडियो से कैरियर का आगाज हुआ, लेकिन हुनर को पहचान मिली नाटक मंडली में। मंडली ने दरअसल उन्हें व आनंदराव को मंचीय चित्रकला के लिए आमंत्रित किया था। प्रतिभावान बाबूराव को ‘पेंटर’ नाम से यहीं नवाजा गया। गोविंद फाल्के की पथ-प्रदर्शक ‘राजा हरिश्चंद्र’ के महान प्रभाव में बाबूराव फिल्मों की ओर आकर्षित हुए । तकरीबन पांच वर्षों के संघर्ष को तय कर ‘महाराष्ट्र फिल्म कंपनी’ स्थापित करने के मुकाम तक आए।
कंपनी की पहली प्रस्तुति ‘सैरेन्द्री’ कई मायनों में ऐतिहासिक रही। फिर ‘सिंहनाद’ एवं ‘साहूकारी पाश’ भी इसी निरंतरता में रिलीज हुई थी। शाषक वर्ग की दमनकारी नीतियों के संदर्भ में ‘साहूकारी पाश’ की कहानी एक महान दस्तावेज के समतुल्य थी। हिंदी सिनेमा में इस मिजाज की फिल्में कम ही हैं। इन प्रस्तुतियों ने महाराष्ट्र फिल्म कंपनी को काफी ख्याति दी। भारतीय सिनेमा को वी शांताराम इसी बैनर से मिला। प्रभात टाकीज की स्थापना दरअसल बाबूराव पेंटर की अमर विरासत से प्रेरित थी।
जाने माने फिल्मकार राजकुमार संतोषी के पिता पी एल संतोषी को हिंदी सिनेमा शायद भूल चुका है। हिंदी सिनेमा का शताब्दी वर्ष संतोषी जी जैसी शख्सियतों को मुडकर देखने का अवसर दे रहा है। बांबे टाकीज से फिल्मों में आने वाले संतोषी एक योग्य गीतकार, पटकथा-लेखक, निर्देशक थे। बांबे टाकीज की पथ-प्रदर्शक प्रस्तुति ‘किस्मत’ के पटकथा लेखकों में पी एल संतोषी का भी शुमार है। प्रभात टाकीज की ‘हम एक हैं’ से सिनेमा में दाखिल होने वाले देव आनंद को संतोषी ही लेकर आए थे।संतोषी अपनी फिल्मों की कथा-पटकथा- गाने स्वयं लिखते थे। फिल्म विधा के विभागों में व्यापक हस्तक्षेप के इच्छुक संतोषी ने हिंदी सिनेमा में खास पहचान कायम की।
दिलीप कुमार का नाम सभी सुना होगा, लेकिन उनके भाई नासिर खान को लोग कम ही जानते हैं। पाकिस्तान की फिल्मों से कैरियर का आगाज़ करने वाले नासिर ने हिंदी फिल्मों में भी काम किया। चालीस के दशक में वो कुछ फिल्मों में नजर आए थे। आफर्स की कमी ने उन्हें लाहौर जाने को विवश कर दिया। यहां आकर अभिनय के साथ फिल्म-वितरण से भी जुड गए। नासिर साहेब ने एक वितरण कंपनी के तहत दिलीप कुमार की फिल्मों का वितरण शुरू किया। पचास के दशक में पाकिस्तान से वापस आकर हिंदी फिल्मों का फिर से रूख किया।
तकरीबन आधा दर्जन फिल्मों में अभिनय से एक सकारात्मक वापसी की। उस दौर में नरगिस, सुरैया,मीना कुमारी,बेगम पारा तथा नूतन का बडा रूतबा था। नासिर खान ने इन सभी बडे नामों के साथ काम किया। साठ के दशक में रिलीज हुई ‘गंगा जमुना’ नासिर खान की एक स्मरणीय फिल्म रही। नीतिन बोस ने उन्हें ‘जमुना’ का महत्त्वपूर्ण किरदार दिया। क्रांतिवीर गंगा (दिलीप कुमार) का न्याय प्रिय जमुना(नासिर खान) से सामना था। हिंदी सिनेमा में इस मिजाज की कहानियां बाद में बदले हुए स्वरूप में भी देखने को मिली।
सत्तर का दशक हिंदी सिनेमा में परिवर्तन का समय लेकर आया। इस युग में रूमानियत व प्रतिशोध की धाराएं सिनेमा की भाषा बनी हुई थी। पचास व साठ दशक के बडे नाम युवा सितारों के कारवां से थोडे किनारे हो गए। रूमानियत से आगे के वक्त पर विचार कर सलीम-जावेद ने ‘प्रतिशोध’ की संकल्पना की। अमिताभ की ‘एंग्री युवा छवि’ ने रूमानी कहानियों से हमारा ध्यान हटा दिया। वर्मा मलिक के युगांतरकारी गीतों ने इस समय को समझा।मलिक जी ने हालांकि अमिताभ के लिए गाने नहीं लिखे। फिर भी बेईमान, पहचान तथा यादगार के गीत आज भी एक खास पहचान रखते हैं।
सिनेमा में भावी पारी को लेकर दिलीप कुमार, मनोज कुमार एवं देव आनंद बहुत गंभीर थे। इस जददोजहद में मनोज कुमार कुछ बेहतरीन फिल्में लेकर आ सके। वर्मा मलिक एवं संतोष आनंद की प्रतिभाओं से इन फिल्मों की तक़दीर संवरी। वर्मा मलिक के गीत — इक तारा बोले (यादगार), सबसे बडा नादान वही(पहचान), जय बोलो बेईमान की (बेईमान), यह राखी बंधन है ऐसा (बेईमान) तथा महंगाई मार गई (रोटी कपडा मकान) आज भी याद किए ज़ सकते हैं । बेहतरीन लेखन के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवार्डस भी मिले। तकरीबन हर शादी-ब्याह का पोपुलर ‘आज मेरे यार की शादी है’ के लेखक को कम ही लोग जानते हैं।
अभिनेत्री ‘शांता आपटे लीक से हटकर काम करने के लिए मशहूर थी । रंगमंच व गायकी से सिनेमा में आने वाली शांता आपटे ने पहले-पहल युवा कलाकार से आगाज किया।राधा-कृष्ण प्रसंग से प्रेरित इस फिल्म में ‘राधा’ की भूमिका आपटे ने ही निभाई थी। तीन वर्षों तक उन्हें अगला काम नहीं मिला। परीक्षा की इस घडी में प्रभात टाकीज ने काम दिया। प्रभात की स्मरणीय प्रस्तुति ‘अमृत मंथन’ ने शांता जी को काफी संबल दिया। कह सकते हैं कि उनके लिए यह महत्त्वपूर्ण
मोड थी। प्रभात के साथ हुए करार ने शांता आपटे की जिंदगी का रूख बदल दिया। बैनर तले बनी ‘दुनिया ना माने’ तथा ‘अमर ज्योती’ को आज भी याद किया जाता है। नारी प्रधान ‘अमर ज्योती’ की कथा में पुरूषों से प्रतिकार रखने वाली स्त्री का किरदार मिला। वहीं ‘दुनिया ना माने’ में बेमेल विवाह से पीडित नव-विवाहिता का रोल भी स्त्री संघर्ष को संबल देता है। वी शांताराम की ‘दुनिया ना माने’ शांता जी की एक अविस्मरणीय फिल्म है ।
प्रभात के साथ कायम करार तीस के उत्तरार्ध में जाकर टूट गया। जिसके बाद किसी अन्य के साथ भी लम्बी समय तक करार नहीं किया। हिंदी सिनेमा में ‘आत्म-सम्मान’ की ऐसी मिसाल कम ही देखने को मिलेगी। पहचान की लडाई में दक्षिण भारतीय फिल्मों की ओर भी गयी थीं। फिर लाहौर में तब के महत्त्वपूर्ण बैनर ‘पंचोली फिल्मस’ की पथ-प्रदर्शक ‘जमींदार’ साईन किया।
देवकी बोस की ‘अपना घर’ मीरा नामक युवती व उसके अधेड उम्र पति की कहानी थी। मीरा महज पतिव्रता पत्नी की सीमित दुनिया तक नहीं रहना चाहती। घर की दहलीज से बाहर निकलकर जीवन को दिशा देने की आकांक्षा रखती है। पति को त्याग कर समाज सेवा में निकल जाती है । शांता जी ने इस किरदार को अदा कर सिनेमा में एक खास मुकाम हासिल कर लिया था। कहा जा सकता है कि शांता आपटे की विराट शख्सियत में नारी संघर्ष को बडा आदर्श मिला था।
आजादी के बाद उनके फिल्म ग्राफ में ढलान आया। बहुत गिनी-चुनी फिल्मों में काम किया। ऐसे वक्त में ‘स्वयंसिध’ का रिलीज होना काफी महत्त्वपूर्ण रहा। फिल्म की कथा को सुनकर ऐसा प्रतीत होगा मानो यह शांता आपटे के लिए ही लिखी गयी थी। पित्तृसत्तात्मक समाज में ‘नारी अधिकार’ का समर्थन करने वाली यह फिल्म ताराचंद बडजात्या द्वारा रिलीज की गयी थी। इस जबरदस्त किरदार को बाद में माला सिन्हा ने भी जीवंत किया।
