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अंखियों के झरोखे में बसे गीतकार रविन्द्र जैन

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ग्राम लोहरिया,राजस्थान मे जन्मे सुपरिचित संगीतकार रविन्द्र जैन की आरंभिक शिक्षा संस्कृत व आयुर्वेद गुरु पंडित इंद्रमनी जैन के सान्निध्य मे हुई । रविन्द्र के परिवार मे माता-पिता के साथ सात भाई व एक बहन थी, भाई-बहनो मे इनका स्थान तीसरा है । संगीत की शिक्षा उन्हे पं जी एल जैन,पं जनार्दन शर्मा तथा पं नाथुराम से संयुक्त रूप से प्राप्त हुई । इसके बाद वह कोलकाता पहुंचे और फ़िर अंतत: मुंबई, मायानगरी ने रविन्द्र के कैरियर को स्वपन भरा मुकाम दिया।

Rabindra Jain

रविन्द्र जैन का संगीत सफ़र करीब तीस-चालीस वर्ष पूर्व शुरु हुआ।यह कैरियर ‘एक विवाह ऐसा (राजश्री प्रोडक्शन) तक कायम रहा है । बतौर संगीत निर्देशक ‘ चोर मचाए शोर’ (1974) पहली फ़िल्म थी । इसके बाद गीत गाता चल (1975), चितचोर (1976), अंखियो के झरोखे से (1978) एवं अमिताभ अभिनीत ‘ सौदागर ’ जैसी फ़िल्मो मे भी अपनी सेवाएं दी । अपने सफ़ल कैरियर मे रविन्द्र को आर के फ़िल्मस (राज कपूर), राजश्री प्रोडक्शन, क्षेत्रीय सिनेमा, धार्मिक फ़िल्म तथा टेलीविज़न मे सेवाएं देने का अवसर मिला।

Nadiya ke Paar

हिन्दी फ़िल्मो मे राजश्री बैनर के लिए अनेक फ़िल्मे की । इसमे नदिया के पार, नैय्या, गीत गाता चल, चितचोर ,अंखियों के झरोखे से, विवाह और एक विवाह ऐसा भी का यहां उल्लेख किया जा सकता है। राज कपूर के बैनर तले बनने वाली : राम तेरी गंगा मैली तथा ‘हिना’ भी रविन्द्र जी के अच्छे काम के लिए याद की जाती है ।

Henna

रविन्द्र ने पार्श्व गायक येसुदास के साथ टीम बनाई, बासु भट्टाचार्य की ‘चितचोर’ और फ़िर ‘नैय्या’ मे इस टीम ने अच्छे गीत दिए । येसुदास को अभिनेता अमोल पालेकर(चितचोर) की आवाज़ के रूप मे विशेष ख्याति मिली। फ़िल्म के ‘जब दीप जले आना’ और ‘गोरी तेरा गांव’ आज भी पहचान बनाए हुए हैं। रविन्द्र येसुदास की सुरों से बहुत प्रभावित रहे, हिन्दी फ़िल्मो मे येसुदास जैसे समर्थवान गायक को लाने का श्रेय इन्हे ही जाता है। किस्सा बासु दा की ‘चितचोर’ का है, अभिनेता अमोल पालेकर की आवाज़ के लिए रविन्द्र को नए गायक की तलाश थी।येसुदास मे उन्हे एक नई आवाज़ मिली, सभी जानते है कि ‘चितचोर’ के गीत आज भी सुने जाते है। 

Chitchor

अपने कैरियर मे अनेक धार्मिक –मिथक फ़िल्मो मे संगीत दिया, साथ ही टेलीविज़न मे भी सक्रिय रहे । टी वी धारावहिको मे ‘रामायण’, ‘लव-कुश’ ,‘अलिफ़ लैला’, ‘दादा-दादी की कहानियां’, ‘सांई बाबा’, ‘श्री कृष्णा’, ‘नुपूर’, ‘उर्वसी’, ‘जय हनुमान’, ‘जय गंगा मैया’, ‘महिमा शनि देव की’, ‘जय मां वैष्णो देवी’ और ‘ भारत के महान संत’ के लिए संगीत तैयार किया। अपने दीर्घ टीवी कैरियर मे ‘सागर आर्ट्स (रामानंद सागर) के साथ सबसे अधिक काम किया। रविन्द्र जी के सिने कैरियर मे संगीत के हर क्षेत्र का समन्वय रहा ,उनके सफ़र मे सिनेमा और टेलीविज़न का अच्छा संतुलन भी देखा जा सकता जा सकता है । 

Ankhiyon ke Jharokhe se

रविन्द्र जैन की संगीतकार शख्सियत के बारे मे जानने के बाद, श्रोता उनमे मौजूद ‘गीतकार’ को भी जानना चाहेंगे। कम ही लोग जानते है कि रविन्द्र जैन एक शानदार गीतकार भी थे। धुनों की यात्रा मे रविन्द्र की लेखन ‘दक्षता’ को भुलाया नही जा सकता, गीतों की धुन तैयार करने के साथ गीत गढने मे भी वह पारंगत रहें ।

Geet Gata Chal

फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार इतिहास मे ‘अंखियों के झरोखे से गीत पर ‘बेस्ट गीत’ का नामांकन मिला, यह गीत रविन्द्र की ही रचना है । फ़िर राजकपूर की ‘हिना’ के शीर्षक गीत ‘ मैं हूं खुशरंग हिना’को भी इस श्रेणी मे नामांकित किया गया। 

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