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बहुआयामी क्षमता के कलाकार ‘ओमपुरी’

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ओम पुरी के नाम आते ही आक्रोश और अर्धसत्य जैसी फिल्में याद आ जाती हैं। पिछली शताब्दी के आठवें दशक हिंदी सिनेमा में कला फिल्मों का दौर याद आता है । वो ज़माना जब देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक समस्याओं को गहराई में जाकर पर्दे पर दिखलाने की क्रांतिकारी पहल हुई। नायक नायिका का पॉपुलर कांसेप्ट बदल दिया गया था। आम आदमी की शक्ल-सूरत वाले कलाकारों को स्पेस मिला।

Om Puri

ओमपुरी, नसीरुद्दीन शाह कुलभूषण खरबंदा, अनुपम खेर, नाना पाटेकर, शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, मिथुन चक्रवर्ती जैसे कलाकार उभर कर सामने आए । वास्तविक अभिनय के बल पर कला फिल्मों की पहचान बन गए । व्यावसायिक फिल्मों के कलाकारों समान रूप-सौंदर्य इन्हें प्राप्त नहीं था। अभिनय इनका सौंदर्य बना। ओमपुरी इसी स्वर के प्रखर प्रवक्ता थे। अभिनय के दम पर अंतर्राष्ट्रीय पहचान तक बना ली थी।

Arohan

लेकिन अभिनेता बनने का उनका सफ़र संघर्ष का सफ़र था ओम पुरी ने बचपन से ही बहुत संघर्ष किया। पांच वर्ष की उम्र में ही वे रेल की पटरियों से कोयला बीनकर घर लाया करते थे। थोड़ा बड़े हुए तो होटल में छोटे मोटे काम करने लगे। सरकारी स्कूल से पढ़ाई कर कॉलेज पहुंचे। छोटी-मोटी नौकरियां तब भी करते रहे। कॉलेज में ही ‘यूथ फेस्टिवल’ में भाग लेने के दौरान आपका परिचय पंजाबी थिएटर के मशहूर हरपाल तिवाना से हुआ। यह मुलाकात अहम मोड़ साबित हुई । यहीं से आपको रास्ता मिला जो आगे चलकर ओमपुरी को मंजिल तक पहुंचाने वाला था।

Om Puri

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बाद ‘फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया’ से एक्टिंग का कोर्स करके ओम मुंबई चले आए । यहां से एक दूसरा संघर्ष शुरू हुआ। कला फिल्मों से शुरुआत की जो आगे चलकर टेलीविजन, व्यावसायिक फिल्मों एवं हॉलीवुड तक जारी रहा। एक दुबले-पतले चेहरे पर कई दागों वाला युवक भूखी आंखों और लोहे के इरादों के साथ अंतराष्ट्रीय स्तर का अभिनेता बन गया।

Om Puri -Naseer

ओम पुरी सिनेमा के बेशकीमती हीरा थे। क़रीब चालीस साल लंबे फ़िल्मी सफ़र में उन्होंने कई यादगार कामों का तोहफ़ा दिया। आर्ट सिनेमा में आपका मुक़ाबला सिर्फ़ नसीरुद्दीन शाह से था। ओम ने नसीर को कड़ी टक्कर दी। कुछ फ़िल्मों में तो वे नसीर से भी आगे निकल गए।

ArdhSatya

हरियाणा के अंबाला में 18 अक्टूबर 1950 को जन्मे ओम पुरी के अभिनय में कई शेड रहे। आक्रोश सबसे बेहतरीन जमा। मजबूर आदमी के गुस्से को प्रभावी ढंग से ओम ने ही व्यक्त किया । पॉपुलर सिनेमा में एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन ने यह काम किया। लेकिन दोनों में तुलना ठीक नहीं।

गोविंद निहलानी की ‘अर्द्धसत्य’ हिंदी सिनेमा की मील का पत्थर है। सब इंस्पेक्टर अनंत वेलेंकर के किरदार में ओमपुरी का यादगार अभिनय आज भी याद आता है। कुंठा, तनाव, बेबसी से उपजे गुस्से को ओम ने पूरी शिद्दत से उभारा । वेलेंकर राजनेता का पालतू कुत्ता बनने से इन्कार करते हुए उसे मार देता है।

गोविंद निहलानी के ही टीवी सीरियल तमस ने भी ओम को अमर कर दिया। भीष्म साहनी के उपन्यास पर बने तमस में भारत-पाकिस्तान बंटवारे की त्रासदी बयां हुई थी । श्याम बेनेगल की ‘भारत एक खोज’ में सूत्रधार के रूप में ओम ने अदभुत काम किया ।

Jaane bhi do Yaaro

सूत्रधार की आवाज़ आपकी आवाज़ बन गई। कई प्रोजेक्ट के लिए ओम ने सूत्रधार की आवाज़ दी। बहुआयामी प्रतिभा के धनी ओम हांस्य व्यंग्य के भी अद्वितीय अभिनेता थे । कुंदन शाह की ‘जाने भी दो यारो’ आज भी नहीं भूली। टीवी धारावाहिक ‘कक्का जी कहिन’ हांस्य व्यंग्य का लाजवाब उदाहरण था।

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1 Comment
  1. Avinash Ghodke says

    Naman