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समकालीनता का विजयी रथ ‘काला’

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पा रंजीत की ‘ काला’ आज की राजनीति की महत्वपूर्ण फिल्म है। रजनीकांत की करिश्माई काला कहानी है तिरुनेलवेली के एक गैंगस्टर की जो बाद में धारावी का किंग बन जाता है । वो ताकतवर नेताओं और भू माफियाओं से जमीन की लड़ाई लड़ता है।  हिंसा, शक्ति मसीहाई अंदाज़ शामिल थी । हिंसा, एक्शन और इमोशन को एक साथ संयोजित करने सफल होती है फ़िल्म।

रजनीकांत की ऊर्जा व उत्साह आश्चर्यजनक लगता है। पंकज त्रिपाठी को पुलिस अधिकारी के रूप में बहुत ही कम स्क्रीन टाइम मिला। किंतु उसमें भी उनकी अदा दर्शकों को लुभा गई। समुथी काला की पत्नी के रूप में दर्शकों को भावुक बनाती है। नाना पाटकर का अहंकारी व शातिर न के रूप रुचि बनाता है।  कुल मिलाकर ‘काला’ समकालीन दौर की एक सुंदर फिल्म कही जाएगी। नाना पाटेकर और रजनीकांत को एक साथ देखना दिलचस्प है। दोनों के बीच हर सीन पैसा वसूल लगता है।

काला की पत्नी सेल्वी के रोल में ईश्वरी राव व बेटे की गर्लफ्रेंड के रूप में अंजली पाटील ने अच्छा काम किया।
रजनीकांत के टेक्निकल क्रू सिनेमटॉग्रफर मुरली, म्यूज़िक डायरेक्टर संतोष नारायण, एडिटर श्रीकर प्रसाद और आर्ट डायरेक्टर रामालिंगम ने बेहतरीन काम दिखाया है।  रजनीकांत की ‘काला’ में पा रंजीत की कल्पनाशीलता आकर्षित करती है। वे बारीक रास्तों से बहुजन भारत की वैचारिकता को उभारते हैं। फ़िल्म के संवाद एवं चित्र इत्यादि से बहुजन भारत की उपस्थिति का बेबाक चित्रण होता है। एक समर्पित अंबेडकरवादी पा रंजीत की निष्ठा बहुजन भारत के पक्ष में नजर आती है। वे जिस विचारधारा को लेकर चल उसे शक्ति के साथ उन्होने सबके सामने रख दिया। रजनीकांत की छवि को बहुजन हित के लिए खुबसुरती से इस्तेमाल किया । इसे उनकी कल्पनाशीलता और निष्ठा की विजय मानी जानी चाहिए

बहुजनों की ग़रीबी, शहरीकरण की समस्याओं और दलित मुस्लिम एकता का जो चित्रण इसमें हुआ वो महत्वपूर्ण है।विषय का चयन पा. रणजीत को अन्य फिल्मकारों से अलग करता है। अपनी दोनों फिल्में ’कबाली’ व ‘काला’ में उन्होंने बहुजनों के सांस्कृतिक कामनाओं को वृहद फलक पर रखा । ‘काला’ किंतु ‘कबाली’ से आगे की फिल्म साबित होती है। कबाली अध्ययन और सम्मानपूर्ण पहनावे को महत्वपूर्ण मानती है। जबकि ‘काला’ एक विशाल संरचना खींचती है। ‘काला’ वर्चस्व की विचारधारा की प्रतिकार करती है। कुल मिलाकर फ़िल्म समकालीन समय की जरुरी हस्तक्षेप तौर पर उभरती है

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