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INTERVIEW ”TABU” : मेरी जिंदगी में कुछ भी ऐसा नहीं जो मेरी ” माँ ” से अलग हो …

हैदर हो या हालिया रिलीज़ अंधाधुन या फिर अभी अभी आई फिल्म दे दे प्यार दे…तब्बू (TABU) ने अपने किरदार की रौशनी से हर फिल्म को अलग स्तर दिया है..उनकी फिल्मों, किरदार और मां से उनके रिश्ते पर खास बातचीत की हमारे रिपोर्टर शौनक जैन ने..पेश है उस बातचीत के खास अंश।

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रिपोर्टर- तब्बू(TABU) ये देखने से एक कॉमेडी फ़िल्म लग रही है। तो ये कॉमेडी करने में आपको कितना मज़ा आया और कितना मुश्किल रहा क्योंकि इसमें इमोशन्स कॉमेडी साथ साथ हैं।
तब्बू- सही कहा आपने ये फ़िल्म सिर्फ कॉमेडी नही हैं। मतलब सीरियस सिचुएशन को खुशनुमा तरीके से दिखाया गया है। फ़िल्म की कहानी तो बहुत पेचीदा है …लेकिन मज़ा इसीलिए आया क्योंकि फ़िल्म में अलग रिश्ते हैं जो हम अब तक इस मेच्योरिटी के साथ नहीं देख पाए हैं वो दिखाया है… इंडियन स्क्रीन्स पर उन रिश्तों को बिलकुल करीब से दिखाया गया है और हर कैरैक्टर वो रिश्तों के साथ कैसे डील करता है वो दिखाया गया है। डॉयलॉग्स बहुत फनी हैं जैसे लव रंजन लिखते रहे हैं तो मज़ा तो बहुत आया..

रिपोर्टर -अजय सर के साथ काम काम करते हुए कितना बदलाव या बेहतरी देखी आपने क्योंकि आप एक अरसे से उनकी दोस्त हैं।
तब्बू- बदलाव की बात करूं तो एक इंसान के तौर पर वो नही बदले हैं.. प्रोफेशनल तौर पर देखूं तो वो हमारी इंडस्ट्री के सबसे भरोसेमंद कलाकारों में से एक हैं।बहुत सारी अलग अलग किस्म की फिल्मों में और मंझे हुए डायरेक्टर्स के साथ काम किया है उन्होने। एक्शन की है, कॉमेडी की है, इंटेंस रोल्स परदे पर पेश किए हैं, बायोपिक्स भी की हैं तो उनकी काबिलियत पर कोई सवाल है ही नहीं है।

रिपोर्टर-आपने कहा है कि ये फ़िल्म सोशल कंडीशन को सामने लाती है वो भी एक मजेदार अंदाज़ में.. आज के ज़माने में भी उम्र का फर्क अच्छे से नहीं लिया जाता है। आपके इस पर क्या ख्याल हैं।
तब्बू- इस फ़िल्म की बात करें तो ये फ़िल्म इस बारे में नही है। शायद ट्रेलर से हमे ऐसा थोड़ा लगता है मगर ऐज डिफरेंस फ़िल्म का विषय नहीं है, रिलेशनशिप्स और वो किस तरह ज़िन्दगी पर असर करती हैं वो इशू है फ़िल्म का।एज डिफरेंसके बारे में सबका अपना एक अलग ख्याल होता है। एक रिलेशनशिप में क्या होता है और उनके खयाल क्या हैं ये सिर्फ वो दोनो लोग ही जानते हैं। हां कुछ सामान्य बातें और चीज़े है लेकिन जब दो लोग जिनकी नीड्स और एस्पिरेशन्स होती है दूसरे जेंडर से तो उनकी रिलेशनशिप भी अलग होती है। मुझे लगता है कि ये सब आपको क्या पसंद है उसपर निर्भर करता है। आपको किसी बड़े आदमी के साथ रहना है या बड़ी औरत के साथ ये सब आप पर है।

रिपोर्टर-आज कल आप हर फ़िल्म में एक नया किरदार निभा रहीं हैं। क्या कोई ऐसा किरदार पुरानी फिल्मों में से है जिसे आप दोबारा निभाना चाहेंगी?
तब्बू– वैसे तो आप किरदारो से आगे ग्रोथ कर लेते हो लेकिन कुछ किरदार जो मुझे बहुत प्यारे है वो करीब रह जाते हैं.. जैसे हु-तू-तू का किरदार, मक़बूल का किरदार, हैदर का किरदार, अस्तित्व या फिर माचिस…क्यों न सभी के रीमेक बना दें अब (हंसते हुए)।

रिपोर्टर – आपने पहले चीनी कम फिल्म भी की है जिसका सब्जेक्ट दे दे प्यार दे जैसा ही था..तो क्या कभी आपको ये दो कहानी एक जैसीं लगीं फिल्म करते वक्त?
तब्बू- ये भ्रम सिर्फ ट्रेलर की वजह है वर्ना वो फिल्म एज-गैप पर थी और इसमे ऐसी बस एक एलिमेंट है ऐसा वो भी बहुत चीनी कम जैसा नहीं ।ये अजय और रकुल की प्रेम कहानी है जो एक दूसरे की तरफ आकर्षित हैं और मुझे नहीं लगता कि इसमे उम्र का कोई सवाल आता है बल्कि और भी ज़्यादा अलग इश्यूज़ हैं।

रिपोर्टर – आपने कई बड़े डायरेक्टर्स जैसे गुलज़ार साहब, विशाल भारद्वाज और श्रीराम राघवन सभी के साथ काम किया है और अभी नए डायरेक्टर्स के साथ भी काम कर रहीं हैं। तो क्या फर्क है इन दो अलग समय के डायरेक्टर्स के डायरेक्शन के तरीके में और वो कैसे ट्रीट करते हैं अपने स्टार्स को?
तब्बू- तो बात ऐसी है कि उस ज़माने के डायरेक्टर्स मुझे से काफी सीनियर और बड़े थे और जिनके साथ में अभी काम कर रही हूँ वो या तो मेरी उम्र के है या मुझसे भी छोटे तो जिस तरह से बाते और बर्ताव होता है उसमे फ़र्क तो आएगा ही क्यूंकि हम सब बड़े हो गए हैं और हर किसी का स्टाइल अलग होता है। तब डेविड धवन के साथ काम करना बहुत अलग था ..गुलज़ार या मनिरत्नम से तुलना करें तो सब अलग अलग लोग है.. तो मुझे लगता है कि हर निर्देशक का अपने अभिनेता से बात करने का एक अलग ढंग होता है। कुछ बड़े प्यार से काम करवाते हैं और कुछ थोड़ा दूर रहना ठीक समझते हैं।

रिपोर्टर -आपके फेवरेट डायरेक्टर कौन है? जिनसे आपको बहुत ज़्यादा सीखने को मिला किसी प्रोजेक्ट मे साथ काम करते वक्त ?
तब्बू- बहुत से हैं वैसे तो जैसे गुलज़ार साहब, आंग ली, मनिरत्नम, विशाल के साथ मेरा एक बहुत ही खूबसूरत वर्किंग रिलेशनशिप रहा है। हर निर्देशक से आपको कुछ न कुछ सीखने को मिलता है।मैने हर अनुभव का आनंद लिया है.. अलग अलग माइंडसेट के साथ काम करने का मौका मिला है। हैदर के बाद मैने गोलमाल की उसके बाद दृश्यम तो हर डायरेक्टर की एक अलग दुनिया होती है जिसका आपको हिस्सा बनने का मौका मिलता है। जैसे गोलमाल कॉमेडी फ़िल्म थी उसमें आप जाकर एक बंच ऑफ वंडरफुल एक्टर्स और कॉमिक टाइमिंग वाले एक्टर्स के साथ काम करते हैं.. हैदर में आपको एक अलग एक्सपीरियंस होता है तो मुंझे लगता है कि हर फ़िल्म में एक अलग सीख मिलती है अगर आप उसको पहचानने की सलाहियत रखते हैं तो।

रिपोर्टर – मदर्स डे गुजरा है..मां के साथ अपने रिश्ते के बारे में बताएं।
तब्बू – मैं तो अभी भी मां के ही साथ रहती हूँ। मेरी मां मुझे लंच ब्रेक में आकर खाना खिलाती थी। एक गार्डेन था हमारे स्कूल के सामने और मैं      ” B ,C & D” को उल्टा लिखा करती थी। तो मां ब्रेक में आके मुझे खाना खिलाती और मेरी गलतियों को सही कर जाती थी। तो ऐसी कोई चीज़ नहीं है मेरी ज़िन्दगी की जो मेरी माँ से अलग है। मेरी ज़िन्दगी की हर चीज़ माँ के साथ जुड़ी हैं तो मैं अपनी ज़िन्दगी को ही उनसे अलग करके देख नहीं सकती हूँ। अब तो हम दोस्त बन गए हैं। पूरी तरह से दोस्त तो आप फिर भी नही बन सकते क्योंकि मां तो माँ है मगर मैं अब उनकी ताक़त को और उनकी मौजूदगी को बहुत ज़्यादा समझनें लगी हूँ उसकी सराहना करने लगीं हूं। उनका रहना मेरी ज़िन्दगी में ऑक्सीजन के जैसे है। माँ से सीखा है मजबूत बने रहना.. इंडिपेंडेंट रहना..बस एक्टिव रहना मैं पूरी तरह नहीं सीख पायी हूँ, मेरी माँ मुझसे कहीं ज़्यादा एक्टिव हैं। मैने उनसे ये सीखा है कि हर हालात में खुद को हिम्मत के साथ खड़ा रखना और बढ़ते जाना ।

रिपोर्टर- क्या आपको भी लगता है वेब सीरीज़ का प्रभाव बढ़ रहा है और वो फिल्मों पर भी असर डाल रहीं हैं.
तब्बू- मुझे ये तो नहीं पता लेकिन वेब की ऑडियंस बहुत बड़ी है और फैन्स भी काफी हैं..ये फैनबेस बड़ा है क्योंकि आपके नज़दीक के जानने वाले भी बात करतें है कि एपिसोड देखा की नही, 6.30 बजे सुबह गेम ऑफ थ्रोन्स लोग देख रहे हैं तो पक्का कह सकती हूँ की ये एक बड़ी दुनिया है।

 

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