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मुहब्बत के पड़ावों का डॉक्यूमेंटेशन करती शॉर्ट फिल्म Humsafar

रिश्तों के ताने-बाने पर खड़ी ‘हमसफ़र’ कह गई कि दूरियों के बाद भी अगर खुदा फ़िर कभी दो बिछडो को मिलने का अवसर दे तो सभी को उसे मौका देना चाहिए।

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मुहब्बत के हरेक पड़ाव का अलग मुकाम होता है, मुहब्बत को दरअसल ज़िंदगी का एहसास कहा जाना चाहिए। इश्क का हर रंग ज़िंदगी में नया पहलू लाता है। युवा फिल्ममेकर मोहम्मद आसिम कमर की पुरस्कृत शॉर्ट फिल्म Humsafar मुहब्बत के नाज़ुक पड़ावों का डॉक्युमेंटेशन करती एक ज़रूरी शॉर्ट फीचर फिल्म है।

अक्सर लोग जीने के मायने मुहब्बत में तलाश किया करते हैं। ज़िदगी में मुहब्बत की जुस्तजू सी हुआ करती है, उसका रोमांस कभी खत्म नही होता। किन्हीं वजहो से अगर रिश्तों में कड़वाहट आ जाए तो बेहतरी की उम्मीद नहीं खोनी चाहिए। रिश्तों को उम्र देने के लिए एक दूसरे को मौके मिलने चाहिए, क्योंकि रिश्तों का बिगड़ना बहुत आसान है लेकिन उन्हें हासिल करने में उम्र गुज़र जाती है। एहसास कभी नही मरता सिर्फ उसका हिस्सा घटा करता है। एहसास को पहचान कर रिश्तों को उम्रदराज़ किया जा सकता है, उन्हें लम्बी उम्र दी जा सकती है।


आसिम कमर Humsafar के ज़रिए एहसास की अहमियत को बखूबी रेखांकित करते हैं। फिल्म की कथा में किसी को हमसफर बनाने व बरकरार रखने की बात करती है। हम जब मुहब्बत के रिश्ते में दाखिल होते हैं तो सुरमयी शाम का आगाज़ होता है। सुरमई शामें उजली सुबहों की ताबीर बनती हैं, खुशनुमा रंगों को खड़ा करती हैं।

आसिम रिश्तों के सफर में पड़ावों  की बात करते हैं, उन्हें एक दूसरे से जोड़कर उनकी अहमियत बताते हैं। मुहब्बत की दुनिया में ये मुकाम हर किसी को पेश आते हैं। फर्क सिर्फ इसकी समझ और गम्भीरता का होता है। रिश्तों के दरम्यान पेश आए तजुर्बे ज़िंदगी को पूरी धूप छांव मे समझने का सलीका देते हैं। प्यार के जज़्बात मे दाखिल होकर मनमुटाव और दूरियों तक की कड़वाहट देखनी पड़ती हैं। इम्तिहान के दौर में रिश्तों में दूरियां हो जाना देखा जाता है। लेकिन यह जल्दबाज़ी, समझ और सब्र की कमी है, दरअसल हम वक्त की चुनौती को नहीं समझ पाते। मौजूदा फ़िल्म में मुहब्बत के हरेक पड़ाव को रचा गया है।

यह हमे आकर्षित करते हुए ज़िंदगी के बहुत करीब ले जाती है। हमारी आपकी बात करती है, सिर्फ समस्या ही नहीं उपाय की ओर भी संकेत करती है।


प्रपोज़ल में लड़का, लड़की को उसकी ताज़ा तस्वीरें देकर जान-पहचान कायम करता है। किसी भी नए से दोस्ती करने का यह दिलचस्प तरीका था। छोटी मुलाकातों से शुरू हुआ सफर प्रपोज़ल व उसके कुबूल होने की रूमानी मंज़िल तक को जाता है। इस पड़ाव पर अक्सर आदमी को महसूस होता है कि अब तक गुज़री जिंदगी बेसबब सी थी। ना कोई जीने का मतलब मालूम था ना ही मायने समझ आए थे। बस यूं ही बेसबब लुढ़कती जाती थी ज़िंदगी जाने किधर। न कोई मकसद था इसका, ना कोई वजह-ए-सफर। ऐसे ही मोड़ पर मुहब्बत मिली तो लगा ज़िंदगी को मिल गया वो मकसद, वो वजह-ए-सफर जिसकी हमेशा से तलाश थी। काश बस वही बन जाती हमनवां, हमनज़र, हमकदम, हमसफर Humsafar ।

SHORT FILM ‘HUMSAFAR’


प्रस्ताव अथवा प्रपोज़ल से आगे बढ़ा सफर रोमांस की दहलीज को पाता है। प्यार के जहान में यह पड़ाव खुद मे खूबसूरती और रूमानियत समेटे रहता है। मेहबूब के साथ गुज़री सुरमई शामें रोज़ाना के बेतरतीब दिनों मे लुत्फ का जादुई एहसास दिया करती हैं। रोमांस की मंजिल पे हमसफ़र से रिश्ता जज़्बात का उरूज होता है। एक मर्तबा जो खुशनुमा पल आ जाएं फिर फुर्सत भरे दिनों की बहुत ज़्यादा गरज नहीं रह जाती। यह वक्त कूछ यूं गुज़रता चला जाता है मानो सारे अहम कामों की कोई बिसात नहीं। मुहब्बत पर ज़िंदगी वार देने से खुशनुमा पल हमें वार दिए जाते हैं। अपनी नीयत पर फक्र सा महसूस होने लगता है। जब वो हमदम हमसफर बन जाता है, सारे नज़ारे प्यारे हो जाते हैं। सब हाल हर सूरत खूबसूरत बन जाते हैं, आदमी इश्क की खूबसूरती में डूब जाता है।


रुमानी वक्त, लम्हों को मज़बूती देकर एंगेजमेंट और शादी तक ले जाते हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि हर मुहब्बत शादी के मुकाम को पाए। जिंदगी के बड़े फैसले मामूली सी लगने वाली खुशियों की गारंटी नहीं समझे जाने चाहिए। हर पल बदलता वक्त रिश्तों का कड़ा इम्तिहान लिया करता है। शक- गलतफहमी मिठास को कडवाहट मे तब्दील करने मे वक्त नहीं लगाते। एक-दूसरे के जज्बातों को इज्जत देकर उन्हे सही तरह पहचान कर ही हम बेहतर दिनों को फ़िर से वापस ला सकते हैं। लेकिन यह पहल दोनों तरफ़ से हो तो बेहतर होता है। आसिम क़मर की फ़िल्म रिश्तों को समझने, संवारने की नेक कोशिश है। यह बात इसमें शिद्दत से उभर कर आती है कि इतिहास के तल्ख पलों को भूला दिया जाना चाहिए।  यादगार लम्हों को जिंदा करने की कोशिश दरअसल रिश्तों को उम्र दिया करती है।


फ़िल्म से गुजरते हुए हमें मालूम होगा कि खूबसूरत पल दिल के मरासिम हुआ करते हैं। बड़ी शिद्दत से बनते,बड़ी नजाकत से इन्हें संभाला जाता है। बड़ी जतन,बड़ी हिफाजत से..मोती चुन-चुन के पिरोना पड़ता है। अक्सर यह जज़्बे चांदी की छलनी मे बिखर -बिखर जाते हैं। इसलिए इन्हें पलकों से लगाने की ज़रूरत होती है। कड़वाहट रिश्तों से भरोसा हटा कर उसे बड़ा नुकसान पहुंचातीं हैं। हमसफ़र जब रास्ते बदल लें तो मंजिल भी बदल जाया करती है,क्योंकि दोनों की जुस्तजू अब एक नहीं रहती। लेकिन सच पूछिए जो ख्वाब दोनों ने मिलकर देखे थे उन्ही के आंखों के सामने टूट-छूट जाए तो आंसू निकल आते हैं जनाब।


रिश्तों के ताने-बाने पर खड़ी ‘हमसफ़र’  कह गई कि दूरियों के बाद भी अगर खुदा फ़िर कभी दो बिछडो को मिलने का अवसर दे,जिंदगी मे फ़िर से साथ होने का मौका दे तो निगाहों की दुरियां,वक्त की दूरियां फना कर अपने हमराह के साथ हो लेना चाहिए। जिंदगी को दूसरा मौका दिया जाना चाहिए। क्योंकि दूसरा मौका बड़ी मुश्किल से मिला करता है। जिंदगी रुकती नहीं कभी किसी मोड़ पर,बस एक मौका और चाहता है हर बशर। जिंदगी को खुशनुमा बनाने की हमें हर मुमकिन पहल लेनी चाहिए।


फ़िल्म से गुजरते हुए महसूस हमें होगा कि नरेशन पक्ष काफी खूबसूरत है। प्यार के हर इक जरूरी पड़ाव को बुना गया है। लेकिन सिर्फ़ वो ही नहीं कलाकार भी निराश नहीं करते। नए चेहरों ने अपने किरदारों को बखूबी समझा है। बैकग्राउंड संगीत वक्त और हालात के उतार चढाव के मुताबिक़ रखा गया है। लफ्ज़ो की बाज़ीगरी व शेर ओ शाइरी का उपयोग कंटेंट को खुबसुरती से स्पोर्ट अपग्रेड करता है। रिश्तों पर बारीकी नजऱ के लिए ‘हमसफ़र’ एक सुंदर विकल्प है।

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