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Dharam Ji Birthday : जब समंदर तैर कर काम के लिए आते थे धरम जी

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Dharam Ji आज इस उम्र में भी फिल्में करते हैं, प्रमोशन में जी जान से लगते हैं और पत्रकारों के पूछे गये सवाल पर हंसते खेलते अपनी जिन्दगी के बहुत से राज खोलते हैं

आज सुपरस्टार और हम सभी के चहेते धर्मेन्द्र का जन्मदिन है। आज वो पूरे 83 बरस के हो गये हैं लेकिन उम्र की इस ढलान पर भी Dharam Ji उनका जोश, जिन्दगी जीने का तरीका और प्रकृति करीब रहकर अपनी जड़ों को न भूलना सभी को बताता है कि व्यक्ति अगर चाहे तो जिन्दगी का हर पल जिन्दगी से भर’पूर जी सकता है। फिल्मसिटी वर्ल्ड आज धरम पा जी की जिन्दगी का एक ऐसा ही किस्सा आपको बता रहा है जो है उन्हीं की जुबानी..

Dharam Ji आज इस उम्र में भी फिल्में करते हैं, प्रमोशन में जी जान से लगते हैं और पत्रकारों के पूछे गये सवाल पर हंसते खेलते अपनी जिन्दगी के बहुत से राज खोलते हैं..हाल ही में उन्होने एक इंटरव्यू के दौरान एक टीस साझा की..उन्होने कहा कि वो पुराने दौर के लोगों को काफी याद करते हैं..जैसे ऋषिकेश मुखर्जी..यहां तक कि उनकी फिल्मों में काम करने वाले कलाकार से लेकर टेक्निशियन सभी को वो बहुत याद करते हैं.

Dharam Ji कहते हैं कि वो बड़े अपने लोग थे…अपने साथी थे वैसा माहौल नहीं जिया उन्होने बहुत अरसे से..वो वक्त ऐसा था जब कोई छोटा बड़ा नहीं था..सभी साथ बैठकर भजिया जलेबी और एक दूसरे का लाया हुआ खाना खाते थे..धरम जी आगा बताते हैं कि मेरा व्यवहार ऐसा था कि सभी के साथ घुलमिलकर रहता और सभी मेरे साथ आउटडोर शूट के लिए तरसते रहते थे।। डांसर..स्पॉट दादा, लाइटमैन सभी मिलते तो किसी भी शूटिंग में उत्सव जैसा माहौल बन जाता था….

मैं मिडिल क्लास फैमिली से आया था देसी आदमी था तो मुझे सबमिलजुलकर मजे करें साथ बैठें ऐसा माहौल भाता था..हम किसी के घर भी खाना खा लेते थे..मैं इस तरह ही पल के बढ़ा हुआ हूं..मैं वही सोनवाल का देसी जट हूं..पंजाब का बेटा हूं..मेरी मां पंजाब है जिसने सजा कर संवारकर महाराष्ट्र मां के हवाले किया और महाराष्ट्र मां ने अपने बच्चों की तरह मुझे पाला..

आज मैं आप सभी पत्रकार बंधुओं से जूहू के पांच सितारा होटल्स या यहीं पास में मेरे घर पर बुलाकर बात करता हूं..लेकिन एक वक्त था साल 1959 के दौर का जब मैं इसी जूहू तक आने के लिए जद्दोजहद करता था..सात बंगला अंधेरी की खाड़ी से जूहू तक हाफ पैंट में  समंदर तैर करके काम मांगने आता था क्योंकि पैसे नहीं होते थे उतने कि किराया दे सकूं..यहां जूहू होटल के पास लाइटें लगीं होतीं थीं.बैंड बजता था वो मैं चुपचाप देखता रहता था..यहां सन एंड सैंड होटेल के सामने एक कॉटेज थी छोटी सी तो मन में सोचता था कि एक दिन ये कॉटेज खरीदूंगा..तब यहां बंगले नही खेत हुआ करते थे..पाली हिल पर बकरियां चरने आतीं थीं..

वो दौर अलग था..धर्मेन्द्र की जुुबान में ये सारी बातें बहुत जल्द एक वीडियो के माध्यम से फिल्मसिटी वर्ल्ड आपतक लायेगा..we love you Dharam Ji

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1 Comment
  1. Avinash Ghodke says

    बढियां