FilmCity World
सिनेमा की सोच और उसका सच

जिंदगी की जीत में यकीं रखने वाले हर किसी के लिए जरूरी फिल्म

बड़ी बजट की फिल्मों के बीच छोटे बजट की फिल्मों का निर्माण हमेशा से एक मुश्किल भरा काम रहा है । चुनौती फिल्म बनाने तक भर होती तो फिर भी ठीक होता । लेकिन मामला रिलीज करना यानी उसे दिन का उजाला दिखाने तक जाता है। जोकि बड़े कशमकश की लड़ाई होती है। फिर भी जीत हौसले की होती है। नागेश कुकुनूर की फिल्म ‘धनक’ को छोटे बजट की ऐसी ही बड़ी फिल्म मानता हूं।

0 45

बड़ी बजट की फिल्मों के बीच छोटे बजट की फिल्मों का निर्माण हमेशा से एक मुश्किल भरा काम रहा है । चुनौती फिल्म बनाने तक भर होती तो फिर भी ठीक होता । लेकिन मामला रिलीज करना यानी उसे दिन का उजाला दिखाने तक जाता है। जोकि बड़े कशमकश की लड़ाई होती है। फिर भी जीत हौसले की होती है। नागेश कुकुनूर की फिल्म ‘धनक’ को छोटे बजट की ऐसी ही बड़ी फिल्म मानता हूं।

कहानी दो अनाथ भाई बहन छोटू (कृष छाबरिया) और परी (हेतल गड्डा) की है जिनका पालन पोषण उनके चाचा (विपिन शर्मा) चाची करते हैं। राजस्थान की पृष्टभूमि पर गढ़ी इस कहानी में जहां एक तरफ छोटू को सलमान खान पसंद है तो वहीं परी के शाहरुख खान फेवरेट हैं । छोटू को आंखों से दिखाई नहीं देता । एक दिन परी को पता चलता है की छोटे भाई की आंख सिर्फ और सिर्फ शाहरुख खान की एक मुहीम की वजह से आ सकती है। उसी दिन परी अपने भाई को लेकर जैसलमेर में शूटिंग कर रहे शाहरुख खान से मिलवाने के लिए निकल पड़ती है। दरअसल परी भाई के नवें जन्मदिन से पहले उसकी आंखों की रोशनी वापस लौटाना चाहती है। भाई को आंखों का बेशकीमती तोहफ़ा देने का ख़्वाब लिए वो सुपरस्टार शाहरुख खान की खोज में निकल पड़ती है। क्योंकि नेत्रदान की अपील करते हुए परी ने शाहरुख को पोस्टर में देखा था। इस तरह बहन-भाई के प्रेम और बहन की हिम्मत की प्यारी और मोह लेने वाली कहानी बन जाती है । बहन-भाई रास्ता जाने बगैर भी मंजिल तक पहुंचने के लिए घर छोड़ देते हैं ।

फिल्म ‘धनक’ बसी है राजस्थान में । धनक’ से नागेश कुकूनूर एक बार फिर छाप छोड़ने में कामयाब रहे । एक बार फिर अपने मिजाज की लीक से हटकर फिल्म बनाई। जोकि सिनेमा के तलबगारों की कसौटी पर पूरा खरा उतरी। यहां एक सकारात्मक संदेश बडी सरलता के पेश मिलता है । कहानी के साथ-साथ राजस्थान की सुंदरता फिल्म का मज़बूत पहलू बनके उभरती है। नागेश ने फिल्म को दिलकश शूट किया है। राजस्थान के रंग फिल्म को आकर्षक बनाते हैं। संगीत भी फिल्म की मज़बूत कड़ी है। कृष के हिस्से के चुटीले संवाद अभिनय पक्ष को संभालते हैं । नेत्रहीन के रूप में उन्होंने बढ़िया अभिनय किया पो। वहीं हेतल सचमुच कृष की बड़ी बहन लगती हैं। जो हर कदम पर भाई के साथ है। उसकी जिंदगी के हर अभाव को पूरा करने वाली छाया।

एक बेहतरीन फिल्म भावनाओं का ज्वार-भाटा पैदा करती है। उसमें सत्य व जादूगरी का महान सामंजस्य होता है। हंसाती और रुलाती है। रिश्तों का अनोखा ताना-बाना रचती है। वह सबके लिए होती है। नागेश की ‘ धनक ‘ में भी ऐसे ही इंद्रधनुषी रंग है। इसमें वो तमाम रंग हैं। इंद्रधनुष की तरह। धनक को दूसरे शब्दों में इंद्रधनुष ही कहते हैं। नैसर्गिक मन मोह लेने वाला सतरंगी जहान। राजस्थान के संगीत और रेतीली जमीन की खूबसूरती को कैमरे में कैद करना नागेश को बहुत अच्छे से आता है। वो अपने कला के उत्कृष्ट साधक हैं। धनक में नागेश ने मरुभूमि के जीवन के बखूबी रंग बिखेरे हैं। शारीरिक अक्षमता धनक के मुख्य पात्र का दर्द है । नागेश शारीरिक अक्षमता को बाधा न मान कर असंभव को पाने का रास्ता मानते हैं। आपके किरदार शारीरिक अक्षमता को परास्त कर जीत का रास्ता निकालते हैं। नागेश कुकुनूर की ज्यादातर फिल्में प्रयास को सफलता की मार्ग बताती हैं। इसलिए उन्हें उम्मीदों का फिल्मकार कहना गलत नहीं होगा।

इकबाल ‘ जैसी ज़बरदस्त फ़िल्म देने वाले नागेश कुकुनूर की ‘ धनक ‘ को बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए चुना गया । यह किताब की भी शक्ल अख़्तियार कर चुकी है। नागेश की ‘ डोर’ के बाद राजस्थानी संगीत का कमाल धनक में भी शिद्दत से नज़र आना जादू भर जाता है । संगीतकर तपस रेलिया ने उत्कृष्ट काम किया है। दमा-दम मस्त कलंदर जैसे गाने विशेष आकर्षण बनकर सामने आते हैं। राजस्थान के कण-कण में बसे संगीत को फिल्म ने कुछ इस तरह जीया कि संगीत कहानी का किरदार बन गया । हौसला बंधाने वाली ‘ धनक’ में खूबियां अधिक हैं । कमियां ढूंढने पर मिलती हैं। जिंदगी की जीत में यकीं रखने वाले हर किसी के लिए जरूरी फिल्म।

Leave A Reply

Your email address will not be published.