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नसीरुद्दीन शाह : वो कलाकार जिसने अपने जिंदगीभर के अधूरेपन को उम्दा अदाकारी से भर दिया

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एक बच्चा जो बचपन में बहुत शरारती था वो नैनीताल के बोर्डिंग स्कूल में गया तो अंदर से भरता चला गया. कलेक्टर पिता और दो पढ़ाकू बड़े भाइयों के बीच किताबों और नंबर्स की दुनिया में उसका जी न लगा. पिता डिप्टी कलेक्टर थे बच्चे के लिए डॉक्टरी पेशा चुन रखा था उसे बस इतना करना था कि पिता की इच्छा को सरमाथे लगाकर डॉक्टर बन जाना था क्योंकि दो बड़े भाईंयों ने ऐसा ही किया था एक फौज में चला गया तो दूसरा इंजीनियर बन गया. लेकिन नसीर को पिता को कैसे बताए कि उसे डॉक्टर नहीं एक्टर बनना है. बस यहीं से पिता और उसके बीच डॉयलॉग होना बंद हो गया. घर में पढ़ाई का मौहाल होते हुए भी फिल्में देखने की छूट थी तो 3-4 साल की उम्र से थिएटर में फिल्में देखने लगे नसीर. बोर्डिंग स्कूल में नंबर कम आते थे तो वहां कि ड्रामा एक्टिविटी में उन्हें मौका नहीं मिलता था क्योंकि वो काम भी होनहार स्टूडेंट के हवाले था.

उनके भाई पढ़ाई में अच्छे थे तो ड्रामा में भी मौका मिलता और बेस्ट एक्टर का अवार्ड भी मिलता था. नसीर को ये देख के कोफ्त होती कि जो काम वो बढ़िया कर सकते हैं उसे भी पढ़ने वालों के हवाले कर दिया गया है और उन्हें मौका नहीं मिलता. नसीर ने फिर भी अपनी प्रैक्टिस जारी रखी वो प्राण जीवन जैसे एक्टर की खुद से नकल करना सीख गए थे. इस बीच क्रिकेट का भी शौक लग गया और उन्हें एक वक्त लगा कि क्रिकेटर भी बना जा सकता है. पिता को जब ये बात पता चली तो वो नसीर पर नाराज हुए. लेकिन तब तक नसीर ने एक्टिंग वाली बात किसी को बताई नहीं थी.

माता पिता और बड़े भाईयों संग नसीर

क्रिकेट के बारे में जब ज्यादा पता किया तो पता चला कि करोड़ों लोगों के देश में सिर्फ 11 लोग इंडिया के लिए खेल पाते हैं जबकि एक्टर तो ढेर सारे हैं तो क्रिकेट का इरादा छोड़ एक्टिंग में मन लगाना शुरू कर दिया . ये चाहत परिवार से दूर करती गई और जुनून के करीब लाती गई. जब सयाने हुए और समझ आई को इब्राहिम अल्काजी के थिएटर ग्रुप से जुड़े फिर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से होते हुए फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा तो एक्टिंग की नई परिभाषा गढ़ दी. फिल्मसिटी वर्ल्ड की तरफ से नसीरुद्दीन शाह को जन्मदिन की शुभकामनाएं.

 

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