1974 में एक फिल्म आई ’27 DOWN’, जिसने उस साल का बेस्ट फिल्म का नेशनल अवॉर्ड जीता…इस फिल्म को बनानेवाले थे अवतार कृष्ण कौल, जिन्होने अपने पूरे फिल्मी करियर में केवल ये ही एक फिल्म बनाई….इस फिल्म के बाद एक हादसे में वो इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनकी ये एक फिल्म उनके अंदर बसे एक अभूतपूर्व फिल्मकार की झलक दे गई….

27 डाउन आम कहानी दिखाती हुई एक बेहद खास फिल्म है….फिल्म की शुरूआत में एक डायलोग है जो हीरो संजय शिंदे (एमके रैना) बोलते हैं, ‘लोग हैं जो एक जगह से दूसरी जगह पर जाते है और मैं हूं जो कहीं भी चलकर कहीं भी चला जा रहा हूं’….फिल्म का पूरा सारांश इस एक लाइन में है….एक सफर है जिंदगी का, रेल का, सोच का, हालातों का, मजबूरियों का, चाहतों का, उम्मीदों का और नाउम्मीदों का…
फिल्म की कहानी बेहद सरल सी है….एक लड़का (संजय शिंदे) जिसके पिता ट्रेन ड्राइवर है एक हादसे में अपने पैरों से अपाहिज हो जाते हैं…लड़का बड़ा होता और कला के क्षेत्र में उसकी दिलचस्पी बढ़ने लगती है…लेकिन पिता चाहते है कि वो रेलवे टीसी लग जाए क्योंकि उनके मुताबिक रेलवे की नौकरी सबसे सुरक्षित है, साथ की सुविधाएं भी हैं….लेकिन संजय का मन नहीं, वो अभी अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहता है, किसी अलग राह पर जाना चाहता है…लेकिन अपनी पिता की जिद के आगे उसे झुकना पड़ता है और वो रेलवे में टीसी लग जाता है…लेकिन अपनी रोजमर्रा की जिंदगी और उसकी उलझनों से बचने के लिए वो स्टेशन की ही भीड़ में खो जाने की कोशिश करता है…ट्रेन को ही अपना घर बना लेता है…

फिल्म में एक सीन है जहां संजय कई दिन और हफ्तें ट्रेन में बिताने के बाद कल्याण स्थित अपने किराए के कमरे में जाता है…जहां उसका मकान मलिक उससे पूछता है कि इतने दिन कहां थे तो वो बोलता है कि ट्रेन में, फिर वो पूछता है कि, ‘जब ट्रेन में ही रहना है तो ये कमरा किराए पर क्यों लिया है’….तो संजय जवाब देता है, कि ‘चिट्ठीय़ों के लिए तो एक पता चाहिए ना वो ट्रेन में नहीं मिल सकती इसलिए’…..उसका ये जवाब साफ दिखाता है कि वो भागना चाहता है इस आम और मामूली जिदंगी से, लेकिन भाग नहीं सकता और इसी लिए उनसे खुद के संतोष के लिए एक बीच का रास्ता निकाला है…वो रास्ता जो उसके अंदर की बैचेनी को संभाल भी पाता है और उसके पिता की उम्मीदों पर उसे खड़ा भी रहने देता है….
फिल्म में राखी भी है शालिनी के किरदार में….शालिनी एक जवान लड़की जिसके ऊपर उसके परिवार की जिम्मेदारियां है….वो ट्रेन में संजय से मिलती है और दोनों में दोस्ती हो जाती है, दोस्ती पसंद में बदल जाती है और पसंद प्यार में….लेकिन यहां भी मजबूरियों का दामन दोनों के साथ बंधा है…शालिनी के पिता उसके पूरे परिवार को छोड़कर चले गए थे शायद बनारस और इसलिए शालिनी साधुओं से डरती है क्योंकि उसे लगता हैं कि कहीं उनमें से कोई उसके पिता ना हो….शालिनी की मां सिलाई के जरिए बच्चों को बड़ा करती है इसलिए शालिनी सिलाई मशीन से भी डरती है क्योंकि उसी ने उसकी मां की जान ले ली….शालिनी संजय को अपने परिवार से मिलाने पूना ले जाती है…लेकिन वहां वो उसकी हकीकत उनसे छुपाती है उसे अपने साथ एलआईसी में काम करने वाला एक क्लीग बताती है जो शादीशुदा है….संजय के लिए ये सब काफी अजीब है….लौटते वक्त जब वो इसको लेकर शालिनी से सवाल करता है तो वो अपने ऊपर पड़ी जिम्मेदारियां और परिवार की उम्मीदों का हवाला देती हैं…कहती है कि वो उनके रिश्ते के बारे में किसी को बता नहीं सकती, वो अभी शादी का सोच नहीं सकती, उसका परिवार उसके भरोसे जी रहा है और वो उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकती…संजय समझता है…लेकिन पीछे से उसके पिता को उसके और शालिनी के बारे में पता चल जाता है….और वो उसकी शादी कहीं और तय कर देते हैं…वो संजय को अपनी बीमारी की झूठी चिट्ठी भेजकर घर बुलाते हैं, जहां एक बार फिर संजय अपने पिता की जिद आगे झुककर उनकी पसंद से शादी कर लेता है….

लेकिन बावजूद इसके वो खुश नहीं है….वो अभी भी भागना चाहता है….किससे और किस लिए उसे नहीं पता….शादी के बाद वो जब शालिनी से टकराता है तो उससे नजरें नहीं मिला पाता…लेकिन कोशिश करके वो उससे मिलने उसके घर जाता है जहां शालिनी का रूखा रैवेया उसे एहसास कराता है कि उसने गलत किया है…शालिनी के साथ और शायद खुद के साथ भी….
संजय की पत्नी को उसके और शालिनी के बारे में पता चल जाता है…वो गाहे–बगाहे उसे शालिनी को लेकर ताना देती है…अब ये सब संजय के लिए काफी मुश्किल होता जा रहा है…वो समझ नहीं पा रहा कि कैसे इन हालातों का सामना करें….पिता की जिद के आगे उनसे शादी तो कर ली लेकिन वो ये रिश्ता संभाल नहीं पा रहा…उसकी पत्नी और उसमें कोई समानता नहीं…वो वापस शायद शालिनी के पास जाना चाहता है नहीं वो शायद वापस स्टेशन की उसी भीड़ में खो जाना चाहता है…और एक बार फिर वो भाग जाता है सब कुछ छोड़कर ‘बनारस’….पूरा रास्ता वो पुल आने की आस के सहारे काट देता है जैसे शायद ये पुल उसके जिंदगी के रास्ते का कोई अहम मोड़ हो….
बनारस जहां संजय को कोई नहीं जानता….जहां वो किसी को नहीं जानता लेकिन फिर भी वो सबको जानना चाहता है….संजय एक लड़की से मिलता है जो कि एक वेश्या है…उसे संजय के बारे में कुछ नहीं जानना यहां तक की उसका नाम भी नहीं….यहां संजय कुछ वक्त ठहरता है शायद उसको लगता है कि वो ये ही चाहता था…कोई ऐसा जो सिर्फ उसके साथ हो उसे समझे बिना किसी बंधन के बिना किसी बोझ के…लेकिन नहीं यहां भी उसकी उधेड़बुन, उसकी उलझन उसका पीछा नहीं छोड़ती….और वो एक बार फिर भाग जाता है वापस मुंबई….

संजय वापस वहीं आ गया है जहां से चला था….यहां उसकी पत्नी है, ससुर है…लेकिन वो खालीपन…वो भी तो वहीं है, जिससे वो भागा था….फिर एक बार वो शालिनी के पास जाता है उससे माफी मांगने या फिर शायद खुद से माफी मांगने…..दोनों फैसला करने के लिए दूसरे दिन स्टेशन पर 5 बजे मिलना तय करते है….संजय पूरा दिन शाम के 5 बजने का इतंजार करता है वो ट्रेन के जरिए स्टेशन पहुंचता लेकिन उतरता नहीं….क्यों, क्योंकि अब एक फैसला उसने खुद किया कि उसे भागना नहीं है, कहीं पहुंचना नहीं है बस चलना है केवल चलना….जहां रास्ता ले जाए….
ये फिल्म बहुत आसानी के रेल के सफर को जिंदगी के सफर से जोड़ देती है….जैसे रेल के रास्ते सीधे और साधे हुए होते है वैसे जिंदगी के भी होते है….लेकिन अगर हम अपनी पटरियों से उतरकर किसी और रास्ते पर जाना चाहे तो…..तो वापस हमको खींचकर उन्ही पटरियों पर ले आया जाता हैं….भागती–दौड़ती इन रेलगाड़ियों की तरह हम भी अपनी जिंदगी में भाग रहे है….रेल के सफर के शुरूआत और अंत तो ड्राईवर जानता है लेकिन क्या हम अपने सफर के शुरूआत और अंत को जानते है….अगर नहीं को हम इस सफर की गलत शुरूआत तो नहीं कर रहे है और अगर हां तो ये शुरूआत हमें किस अंत तक पहुंचाएगी…27 डाउन इसी उलझन को, इसी सफर को को आपके सामने पेश करती है…
अवतार कौल की इस फिल्म ने दिखा दिया था कि उनके अंदर एक बेहतरीन और अलग किस्म के फिल्में बनाने का मद्दा था…जो हादसे के साथ डूब गया….आप इस फिल्म का ट्रेलर नीचे देख सकते हैं..
